आस्था के प्रश्न बड़े खतरनाक होते है. कुछ लोगों के लिए तो जीवन और मृत्यु से भी बड़े.सत्य साईं बाबा जब आई. सी.यू. में थे, तो मीडिया लोगों को यह बताने की कोशिश कर रहा था की उनकी मृत्यु से लोग गहरे सदमे में आ जायेंगे. कुछ लोगों को गहरा सदमा लगा भी. क्रिकेट के भगवान् की आँख में तो आंसू तक आ गये, उनकी व्यक्तिगत आस्था किसी के प्रति हो सकती है और वे किसी के लिए भी आंसू बहा सकते है इसमें कोई दो राय नहीं. पर मीडिया बहुत सी ख़बरें गड़प कर जाती है. जब साईनाथ के कमरे से करोड़ो की संपत्ति पाई गई तो मीडिया ने इस संपत्ति का सच सबके सामने ज़ाहिर नहीं किया. क्या ऐसा मीडिया ने आस्था के प्रश्नों से बचने के लिए किया या भगवान् के सच को छुपाने के लिए किया.
Sunday, August 7, 2011
मीडिया की आस्था
आस्था के प्रश्न बड़े खतरनाक होते है. कुछ लोगों के लिए तो जीवन और मृत्यु से भी बड़े.सत्य साईं बाबा जब आई. सी.यू. में थे, तो मीडिया लोगों को यह बताने की कोशिश कर रहा था की उनकी मृत्यु से लोग गहरे सदमे में आ जायेंगे. कुछ लोगों को गहरा सदमा लगा भी. क्रिकेट के भगवान् की आँख में तो आंसू तक आ गये, उनकी व्यक्तिगत आस्था किसी के प्रति हो सकती है और वे किसी के लिए भी आंसू बहा सकते है इसमें कोई दो राय नहीं. पर मीडिया बहुत सी ख़बरें गड़प कर जाती है. जब साईनाथ के कमरे से करोड़ो की संपत्ति पाई गई तो मीडिया ने इस संपत्ति का सच सबके सामने ज़ाहिर नहीं किया. क्या ऐसा मीडिया ने आस्था के प्रश्नों से बचने के लिए किया या भगवान् के सच को छुपाने के लिए किया.
Friday, August 5, 2011
कामायनी, रीतिकाल और उर्दू शायरी
हिंदी कविता में प्रसाद कि कामायनी का अन्यतम स्थान है.इस महाकाव्य में प्रसाद ने शब्दों कि जो लड़ियाँ पिरोयीं है और जिस कथ्य के साथ उसे निभाया है वह बेहद खूबसूरत है. हालाँकि कामायनी के कथ्य में मुझे सबसे महत्वपूर्ण पात्र श्रद्धा या मनु नहीं लगते. प्रसाद कि इस रचना का सबसे महत्वपूर्ण चरित्र इड़ा है, जिसे वे बुद्धि का प्रतीक कहते है. श्रद्धा के सारे निर्णय भावुकता से भरे है और मनु का चरित्र ही चरित्रहीन जैसा है. यदि संसार को चलने और इसका नियमन करने कि असली भूमिका कोई निभाता है तो वह इड़ा है. समकालीन अर्थों में आज कि नारी का प्रतीक हैं इड़ा, जो शासन भी करती है और आनेवाले युग के प्रतीक श्रद्धा और मनु के पुत्र को भी सम्हालती है.
इसी तरह रीतिकाल को अक्सर घोर श्रृंगारिकता की उपाधि देकर उस काल की कविताओं को निम्नकोटि में रख दिया जाता है. कविता अपने समकालीन समाज का प्रतीक होती है. आज कोई भरी सभा में वैसी कवितायें सुनाये तो लम्पट कहलायेगा. लेकिन एक वह समय था जब ऐसी कवितायें बाकायदा दरबार में सुनी और सुनाई जाती थी, इस तथ्य की तुलना यदि हम लेओनार्दो द विंची और यूरोप के अन्य महान कलाकारों द्वारा चर्च में बनाये गए चित्रों या भारतीय परिवेश में ही कोणार्क के मंदिरों में बने शिल्पों से करें तो दरबारी या श्रृंगारिक प्रवृत्ति से अलग उस समय के समाज की एक अलग ही तस्वीर उभरती है. हो सकता है वह समाज आज से ज्यादा खुली सोच वाला रहा हो, आज की तरह का दुराव-छिपाव उस समाज में नहीं रहा हो, अन्यथा अभिव्यक्ति की यह स्वतंत्रता नहीं मिलती. समाजशास्त्री भी कहते है समाज सरलता से जटिलता की और बढ़ता है और भाषा जटिलता से सरलता की ओर.
अक्सर रीतिकाल को पढ़ाने वाले हमारे शिक्षकों की दृष्टि इतनी संकुचित होती है की वे खुद उस कविता के मर्म को नहीं समझते, उनकी अपनी मानसिक सोच का दायरा संकुचित होता है. आज जब सरकार भी सेक्स एजुकेशन की वकालत कर रही है तब रीतिकाल की श्रृंगारिक कविताओं को पढ़ने में शिक्षकों को शर्म क्यों आती है. यदि इन कवितों को वो प्रासंगिक नहीं समझते तो सिलेबस में बदलाव की कोशिश क्यों नहीं करते.दरसल हिंदी के ज्यादातर शिक्षक रोटी पानी का परमानेंट जुगाड़ होते ही लम्बी तान कर सोने के आदि होते हैं, कभी कुछ नया करने की सोचें भी तो जिस राह से वे आये होते हैं उस राह के मठाधीशों का विरोध करते सहमते हैं.
फैज़ अहमद फैज़ - अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मगर क्या कीजे.......
उर्दू शायरी में रूमानियत (romanticism ) के साथ इन्क्लाबियत का स्वर उसे क्लासिक बना देता है. इन दोनों के मेल से बनी उर्दू शायरी जिस कोमलता (softness) के साथ व्यंग्य (irony) को जन्म देती है वह विधा के रूप में काव्य का सबसे बेहतरीन नमूना है.
Thursday, August 4, 2011
मीडिया की विदेश नीति
पिछले दिनों जब पाकिस्तान की युवा विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार भारत आईं तो उनके ड्रेसिंग सेन्स और एक्सेसरीज की चर्चा भारतीय मीडिया में खूब रही. अमेरिका से जब हिलेरी क्लिंटन आतीं है तो उनकी एक्सेसरीज और ड्रेसिंग सेन्स भी लाजवाब होती है. उनकी फोटो भी टेलीविजन और समाचार पत्रों में खूब फ्लैश होती है मगर खबर के केंद्र में उनकी एक्सेसरीज या लुक कभी नहीं आता उनकी बात सुनी जाती है और मीडिया उनके द्वारा उठाये गए मुद्दों को हाईलाईट करता है. इसी बात का एक तीसरा पहलु अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और उनकी पत्नी मिशेल ओबामा के साथ जुड़ता है. राजनीतिक गलियारों में बराक को जीतना महत्व दिया जाता है फैशन के गलियारों में मिशेल की उतनी ही तारीफ़ छपती है. अमेरिका का मीडिया मैनेजमेंट हमेशा ' टू दी प्वोइंट' चलता है. वो जिस चीज पर चाहते है मीडिया को उसी पर फोकस करना पड़ता है.
मीडिया का यह का दोगलापन उसके आकाओं की अमरीकापरस्ती का परिणाम है. भारत और पाकिस्तान के रिश्तो में मिठास आये ये अमेरिका चाहता ही नहीं इसलिये मीडिया उसी नीति पर काम करता है जो अमेरिका चाहता है. मीडिया को खबर चाहिए और दोस्ती की ख़बरों से दुश्मनी की ख़बरों में चटखारे लेने की गुंजाइश हमेशा से ही ज्यादा रही है.
इसलिए हिना रब्बानी खार जाते जाते मीडिया से यह नाराजगी जतातीं हैं कि वे फैशन आइकन के तौर पर नहीं बल्कि विदेश मंत्री के तौर पर मीडिया में फोकस कीं गयी होतीं तो उन्हें ज़्यादा अच्छा लगता वाजिब है. पर क्या करें, हिना जी मीडिया के अपने संकट हैं, उनके आकाओं के आका कहीं और बैठे हुए हैं.
Wednesday, August 3, 2011
परंपरागत विषयों की जरुरत और प्रासंगिकता
कुछ लोग इतिहास और भूगोल को नहीं सिर्फ तकनीकी को महत्वपूर्ण मानते हैं. अपने ही सुर को सच्चा और पक्का सुर मानने वाले ऐसे लोगों के लिए दूसरों के अनुभव झूठे और अपने अनुभव ही सच्चे होते है.
बहरहाल तकनीकी के विकसित होने का भी अपना इतिहास होता है और भौगोलिक आवश्यकताएं तकनीकी को जन्म देने से लेकर उसके फेरबदल तक में अहम् भूमिका निभाती हैं. पिछले दिनो इतिहास, हिंदी, संस्कृत जैसे विषयों को दरकिनार करने की कोशिश जोरों पर थी. पर शिक्षकों और छात्रों के भारी विरोध के बाद दरकिनार किये गए ये विषय जैसे तैसे चले जा रहे हैं. जिस तरह मशीनों का इतिहास जाने बिना आप मशीन को नहीं समझ सकते और उसका विकास नहीं कर सकते उसी तरह मनुष्य का इतिहास जाने बिना आप मनुष्य को नहीं समझ सकते. तकनीकी तौर पर आप चाहे कितना शशक्त हो जाएँ जिस समाज में आप रहते है उससे चाहकर भी कट नहीं सकते और उस समाज की सोच आपको निश्चित तौर पर प्रभावित भी करेगी. कभी आपको पीछे धकेलेगी तो कभी आगे बढ़ने का हौसला देगी. लेकिन जब किसी मनुष्य या समाज की सोच आपको पीछे धकेलेगी उस समय उस सोच का इतिहास जान कर ही आप उससे उबर पाएंगे. किसी मनुष्य कि सोच को आप उसका इतिहास और भूगोल जाने बिना नहीं समझ सकते तो फिर किसी देश के इतिहास और भूगोल को जाने बिना क्या आप आगे बढ़ सकते है? इसलिए इन परंपरागत विषयों की जरुरत और प्रासंगिकता कभी ख़त्म नहीं हो सकती.
Monday, August 1, 2011
हंस और कंस
बड़े बड़े फनकारों को अपना फन निखारने में मुद्दतें लगी होगी, ये फनकार बहुत से संगीतज्ञ, नर्तक या नर्तकी से लेकर अदने से साहित्यकार तक की लम्बी फेहरिस्त बनाते है. पर आज की पीढ़ी इनमे से बहुतों का आदर नहीं करती और इस नयी पीढ़ी का जो हिस्सा इनका आदर करने का दिखावा करता है उसका असली मकसद अपना मतलब निकालना होता है. ऐसे में कोई साहित्यकार कब महान और कब उन्ही लोगों के लिए लिजलिजा हो जाये इसकी कोई गारंटी नहीं दी जा सकती. वर्त्तमान बहुत तेजी से पसर रहा है और महान होने की आकांचा भी, फिर भी हमें उम्मीद करनी चाहिए की कभी न कभी तो ये छुटभैये साहित्यकार अपने आराध्य देवों(साहित्यकारों ) की गोपियों को छोड़कर उनकी बंसी के मधुर आलाप के स्वर को कभी खुद भी पहचानेंगे और और उनकी इस बंसी की धुन का अनुकरण करेंगे न की उनकी गोपियों को फुसलाने की कला का.
Sunday, July 31, 2011
प्रेमचंद, हिंदी उपन्यास और दलित
प्रेमचंद को दलित प्रश्न से जोड़कर देखने वाले शायद यह भूल जाते है की जब प्रेमचंद कहानी और उपन्यासों की यथार्थपरक परिभाषा गढ़ रहे थे तो बाकी लोग तिलिस्म और ऐयारी के उपन्यास लिख रहे थे.सीढ़ी एक एक करके ही चढ़ी जाती है और प्रेमचंद ने बहुत सारी सीढिया एक साथ चढ़ी थी. उपन्यासों को तिलिस्म और ऐयारी के खांचे से निकाला, उसे समकालीन जीवन से जोड़ा, समकालीन मुद्दों जैसे आज़ादी का संघर्ष के साथ साथ आने वाले युग की नब्ज़ को पहचानते हुए दलित और स्त्री के प्रश्नों को अपने साहित्य में इस सादगी के साथ उठाया जिसका मुकाबला आज तक कोई लेखक नहीं कर सका है. कम से कम मेरी नज़र में तो ऐसा कोई साहित्यकार या उपन्यासकार नहीं है जिसने ग्रामीण जीवन के ऐसी सीधी और सच्ची अभिव्यक्ति अपने साहित्य में की हो. प्रेमचंद को हिंदी साहित्य के सबसे महान रचनाकार होने का गौरव किसी तूत्पुन्जीये आलोचक ने नहीं आम जनता ने दिया था. हाँ यह कहा जा सकता है उस समय तक ज्यादातर साहित्य पढ़ने वाला मध्यम वर्ग सवर्ण था क्योंकि दलितों के पठन पाठन की प्रक्रिया उन दिनो शुरू ही हुई थी, ऐसी विपरीत परिस्थितियों में भी उनके साहित्य में जिस विद्रोह की झलक मिलती है वही हमारी दलित चेतना के बीज में है. कुछ संकीर्ण दलित लेखक चाहे उनकी इस दलित चेतना पर आक्छेप लगाये पर उन्हें भी यह मानना पड़ेगा की यदि प्रेमचंद ने इसकी शुरुआत न भी की होती तो भी उनका कद कतई कम नहीं आँका जा सकता है. प्रेमचंद ने हिंदी उपन्यास को वह स्वर दिया जिसने हिंदी उपन्यास और कहानी की मज़बूत नीव डाली.
Saturday, July 30, 2011
आज का सच
सबके अपने अपने दुःख है, उसी में गुम सब अपने आप को महान समझते है. कभी ये नहीं सोचते की उन्होंने भी कभी किसी का हक मारा होगा तभी आज कोई और उनका हिस्सा खा गया. लूट तो हर तरफ मची ही है. कहीं आरक्षण के नाम पर लूट तो कही आरक्षण के विरोध में लूट .सवर्ण अपने होनहारों की पीठ तो थपथपाते है पर अवर्णों की पीठ थपथपाना भूल जाते है. ये महान शिक्षक हमारी पीढ़ी का मार्गदर्शन करने वाले द्रोणाचार्य की तरह न अंगूठा काटते है और न उसकी खबर बनने देते है बल्की पूरे के पूरे एकलव्य को गटक जाते है. प्रतिभा के नाम पर इन्हें बस सवर्ण स्टुडेंट दिखाई देता है, बाकी सब इनके लिए नक़ल करने वाले बेवकूफ होते है. अब ऐसे शिक्षकों को आप क्या उपाधि दे सकते है जो सफलता के पैरामीटर भी खुद ही तय करते है और घोड़े पर जीन भी खुद ही कसते है. यह सुखद आश्चर्य ही कहा जा सकता हा ये सारे प्रतिभावान घोड़े सवर्ण होते है. हो सकता है ये बाते जातिवादी लगे पर यही आज का सच है.
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