Thursday, November 11, 2010

लुप्त होती कठपुतली कला

फ़िरदौस ख़ान
भारतीय संस्कृति का प्रतिबिंब लोककलाओं में झलकता है। इन्हीं लोककलाओं में कठपुतली कला भी शामिल है। यह देश की सांस्कृतिक धरोहर होने के साथ-साथ प्रचार-प्रसार का सशक्त माध्यम भी है, लेकिन आधुनिक सभ्यता के चलते मनोरंजन के नित नए साधन आने से सदियों पुरानी यह कला अब लुप्त होने के कगार पर है।
कठपुतली का इतिहास बहुत पुराना है। ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में पाणिनी की अष्टाध्यायी में नटसूत्र में पुतला नाटक का उल्लेख मिलता है। कुछ लोग कठपुतली के जन्म को लेकर पौराणिक आख्यान का जिक्र करते हैं कि शिवजी ने काठ की मूर्ति में प्रवेश कर पार्वती का मन बहलाकर इस कला की शुरुआत की थी। कहानी ‘सिंहासन बत्तीसी’ में भी विक्रमादित्य के सिंहासन की बत्तीस पुतलियों का उल्लेख है। सतवध्दर्धन काल में भारत से पूर्वी एशिया के देशों इंडोनेशिया, थाईलैंड, म्यांमार, जावा, श्रीलंका आदि में इसका विस्तार हुआ। आज यह कला चीन, रूस, रूमानिया, इंग्लैंड, चेकोस्लोवाकिया, अमेरिका व जापान आदि अनेक देशों में पहुंच चुकी है। इन देशों में इस विधा का सम-सामयिक प्रयोग कर इसे बहुआयामी रूप प्रदान किया गया है। वहां कठपुतली मनोरंजन के अलावा शिक्षा, विज्ञापन आदि अनेक क्षेत्रों में इस्तेमाल किया जा रहा है।
भारत में पारंपरिक पुतली नाटकों की कथावस्तु में पौराणिक साहित्य, लोककथाएं और किवदंतियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। पहले अमर सिंह राठौड़, पृथ्वीराज, हीर-रांझा, लैला-मजनूं और शीरी-फरहाद की कथाएं ही कठपुतली खेल में दिखाई जाती थीं, लेकिन अब साम-सामयिक विषयों, महिला शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा, परिवार नियोजन के साथ-साथ हास्य-व्यंग्य, ज्ञानवर्ध्दक व अन्य मनोरंजक कार्यक्रम दिखाए जाने लगे हैं। रीति-रिवाजों पर आधारित कठपुतली के प्रदर्शन में भी काफी बदलाव आ गया है। अब यह खेल सड़कों, गली-कूचों में न होकर फ्लड लाइट्स की चकाचौंध में बड़े-बड़े मंचों पर होने लगा है।
छोटे-छोटे लकड़ी के टुकड़ों, रंग-बिरंगे कपड़ों पर गोटे और बारीक काम से बनी कठपुतलियां हर किसी को मुग्ध कर लेती है। कठपुतली के खेल में हर प्रांत के मुताबिक भाषा, पहनावा व क्षेत्र की संपूर्ण लोक संस्कृति को अपने में समेटे रहते हैं। राजा-रजवाड़ों के संरक्षण में फली-फूली इस लोककला का अंग्रेजी शासनकाल में विकास रुक गया। चूंकि इस कला को जीवित रखने वाले कलाकार नट, भाट, जोगी समाज के दलित वर्ग के थे, इसलिए समाज का तथाकथित उच्च कुलीन वर्ग इसे हेय दृष्टि से देखता था।
म्हाराष्ट्र को कठपुतली की जन्मभूमि माना जाता है, लेकिन सिनेमा के आगमन के साथ वहां भी इस पारंपरिक लोककला को क्षति पहुंची। बच्चे भी अब कठपुतली का तमाशा देखने के बजाय ड्राइंग रूम में बैठकर टीवी देखना ज्यादा पसंद करते हैं। कठपुतली को अपने इशारों पर नचाकर लोगों का मनोरंजन करने वाले कलाकर इस कला के कद्रदानों की घटती संख्या के कारण अपना पुश्तैनी धंधा छोड़ने पर मजबूर हैं। अनके परिवार ऐसे हैं, जो खेल न दिखाकर सिर्फ कठपुतली बनाकर ही अपना गुजर-बसर कर रहे हैं। देश में इस कला के चाहने वालों की तादाद लगातार घट रही है, लेकिन विदेशी लोगों में यह लोकप्रिय हो रही है। पर्यटक सजावटी चीजों, स्मृति और उपहार के रूप में कठपुतलियां भी यहां से ले जाते हैं, मगर इन बेची जाने वाली कठपुतलियों का फायदा बड़े-बड़े शोरूम के विक्रेता ही उठाते हैं। बिचौलिये भी माल को इधर से उधर करके चांदी कूट रहे हैं, जबकि इनको बनाने वाले कलाकर दो जून की रोटी को भी मोहताज हैं।
बीकानेर निवासी राजा, जो कठपुतली व अन्य इसी तरह की चीजें बेचने का काम करते हैं, का कहना है कि जीविकोपार्जन के लिए कठपुतली कलाकारों को गांव-कस्बों से पलायन करना पड़ रहा है। कलाकरों ने नाच-गाना व ढोल बजाने का काम शुरू कर लिया है। रोजगार की तलाश ने ही कठपुतली कलाकरों की नई पीढ़ी को इससे विमुख किया है। जन उपेक्षा व उचित संरक्षण के अभाव में नई पीढ़ी इस लोक कला से उतनी नहीं जुड़ पा रही है जितनी जरूरत है। उनके परिवार के सदस्य आज भी अन्य किसी व्यवसाय के बजाय कठपुतली बनाना पसंद करते हैं। वह कहते हैं कि कठपुतली से उनके पूर्वजों की यादें जुड़ी हुई हैं।
उन्हें इस बात का मलाल है कि प्राचीन भारतीय संसकृति व कला को बचाने और प्रोत्साहन देने के तमाम दावों के बावजूद कठपुतली कला को बचाने के लिए सरकारी स्तर पर कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है।
पुरानी फ़िल्मों और दूरदर्शन के कई कार्यक्रमों में कठपुतलियों का अहम किरदार रहा है, मगर वक़्त के साथ-साथ कठपुतलियों का वजूद ख़त्म होता जा रहा है। इन विपरीत परिस्थितियों में सकारात्मक बात यह है कि कठपुतली कला को समर्पित कलाकारों ने उत्साह नहीं खोया है। भविष्य को लेकर इनकी आंखों में इंद्रधनुषी सपने सजे हैं। इन्हें उम्मीद है कि आज न सही तो कल लोककलाओं को समाज में इनकी खोयी हुई जगह फिर से मिल जाएगी और अपनी अतीत की विरासत को लेकर नई पीढ़ी अपनी जड़ों की ओर लौटेगी।

Wednesday, November 10, 2010

वे तो आचार्य द्रोण है

-श्रद्धा-
प्रतिभाओ को खिलाना था काम जिनका
साँप की तरह कुंडली मारे बैठे है वे
अवसर पर
केवल जाति है
जिनका सरोकार
शैक्षिक उन्नतता की
उन्हें नहीं दरकार
वे तो आचार्य द्रोण है
सदा से ही बैठे है
एकलव्य के अंगूठे की ताक में
और फांस देते है
हर उस कबूतर की गर्दन
जिसे अपने पंखो पर
जरा भी होने पता था
नाज़ .

Tuesday, September 28, 2010

अयोध्या की राख से फिर धुँआ उठने को है


श्रद्धा , २८ सितम्बर २०१०
अयोध्या की राख से फिर धुँआ उठने को है
जो ईमारत ढह चुकी थी नीव फिर खुदने को है
लोग भूल जाते तो बेहतर था उन यादो को
जिनके फैसले लौटा नहीं सकते बुझे हुए चरागों को
हर शहर ने ढ़ोया है बोझ अयोध्या का
बस हो सके तो अब अंत करो इस आतंक का
न बने मंदिर न बने मस्जिद बने तो बस मिसाल बने
फैसला जो भी हो पहले तो हम इंसान बने.

Sunday, September 26, 2010

कुरूप और शहरयार को ज्ञानपीठ पुरस्कार



मलयालम के प्रसिद्ध कवि और साहित्यकार ओएनवी कुरूप को वर्ष 2007 के लिए 43वां और उर्दू के नामचीन शायर शहरयार को वर्ष 2008 के लिए 44वां ज्ञानपीठ दिया जायेगा.

वर्ष 2007 के लिए 43 वें ज्ञानपीठ पुरस्कार पाने वाले ओएनवी कुरूप का जन्म 1931 में हुआ और वह समकालीन मलयालम कविता की आवाज बने. उन्होंने प्रगतिशील लेखक के तौर पर अपने साहित्य सफ़र की शुरूआत की और वक्त के साथ मानवतावादी विचारधारा को सुदृढ़ किया. मगर उन्होंने सामाजिक सोच और सरोकारों का दामन कभी नहीं छोड़ा.

कुरूप पर बाल्मिकी और कालीदास जैसे क्लासिक लेखकों और टैगोर जैसे आधुनिक लेखकों का गहरा प्रभाव पड़ा. उनकी ''''उज्जयिनी'' और ''स्वयंवरम'' जैसी लंबी कविताओं ने मलयालम कविता को समृद्ध किया. उनकी कविता में संगीतमयता के साथ मनोवैज्ञानिक गहराई भी है. कुरूप के अब तक 20 कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं और उन्होंने गद्य लेखन भी किया है. कुरूप को केरल साहित्य अकादमी पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, वयलार पुरस्कार और पद्मश्री से नवाजा गया है.

वर्ष 2008 के लिए 44 वें ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजे गये शहरयार का जन्म 1936 में हुआ. बेहद जानकार और विद्वान शायर के तौर पर अपनी रचनाओं के जरिए वह स्व अनुभूतियों और खुद की कोशिश से आधुनिक वक्त की समस्याओं को समझने की कोशिश करते नजर आते हैं.

इन आँखों की मस्ती के मस्ताने हज़ारों हैं, जुस्तजू जिस की थी उसको तो न पाया हमने, दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिये, कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता. जैसे गीत लिख कर हिंदी फ़िल्म जगत में शहरयार बेहद लोकप्रिय हुये हैं.

इस वक्त की जदीद उर्दू शायरी को गढ़ने में अहम भूमिका निभाने वाले शहरयार को उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, दिल्ली उर्दू पुरस्कार और फ़िराक सम्मान सहित कई पुरस्कारों से नवाजा गया.


खुश होना की हम बेटियां है

खुश होना की हम बेटियां है,
किसी की आँखों की नन्ही तितलिया है.
हममे भी अब सम्भावनाये दिखती है,
दुनिया अब बहुत कुछ हमसे भी सीखती है.


Friday, September 24, 2010

पढ़ने लगे बिरहोर

संदीप कुमार, बगोदर, झारखंड से लौटकर

12 साल की गहनी कुमारी अब ठीक-ठीक हिंदी और अंग्रेजी पढ़ लेती है. हालांकि देश में गहनी जैसे लाखों बच्चे हैं, जो उससे कम उम्र में ही फर्राटेदार अंग्रेजी-हिंदी पढ़ते औऱ बोलते हैं. लेकिन गहनी उन बच्चों से अलग है. गहनी एक बिरहोर परिवार की बच्ची है. बिरहोर यानी कि एक आदिम जनजाति. आदिवासियों-जनजातियों में से भी जो सामाजिक-आर्थिक रुप से बेहद पिछड़े होते हैं, एक ऐसे ही परिवार की बेटी.
इससे पहले की पीढ़ी में किसी ने कभी पढ़ने की नहीं सोची. बिहार और झारखंड में बिरहोर कहने का मतलब है, पूरी तरह से जंगली समुदाय, जिसका नागर समाज से कोई रिश्ता नहीं है. लेकिन अबकि ये विशेषण बदले हैं. शिक्षा का क्या मतलब होता है ये पिपराडीह बिरहोरटण्डा के लोगों से पूछिए. नाम से ही साफ है कि यहां बिरहोर रहते हैं. पिपराडीह बिरहोरटण्डा झारखंड के गिरिडीह जिले के बगोदर प्रखंड में आता है. कल क्या करेंगे और क्या खाएंगे- यहां के बिरहोरों को इसका कुछ पता नहीं. वजह ये कि इनके पास कोई स्थाई काम नहीं है. जूट, सन या फिर सीमेंट के बोरे से रस्सी बनाना इनका पारंपरिक पेशा है, जिससे किसी तरह बिरहोरों के नमक-भात का बंदोबस्त हो पाता है. रहने के लिए घर के नाम पर पेड़ों की टहनियों-पत्तों से बनाए गए ‘कुंभा’ हैं या फिर छोटी-मोटी झोंपड़ी. लेकिन तमाम अभावों के बावजूद इन बिरहोरों की जो सोच हम सबको प्रभावित और प्रेरित कर सकती है वो है शिक्षा के प्रति इनका बढ़ता रूझान. खाने को लाले पड़ने के बावजूद पढ़ने की जो ललक यहां के बिरहोरों में दिखती है, वो काबिले-तारीफ भी है और काबिले-गौर भी. हालांकि पुरानी पीढ़ी के किसी भी महिला-पुरूष ने स्कूल की पढ़ाई पूरी नहीं की है पर नई पीढ़ी में पढ़ने-लिखने का उत्साह देखते ही बनता है.पिपराडीह बिरोहोरटण्डा यही कोई 12 घरों का एक झुरमुट है. चारों तरफ खेत और बीच में बिरहोरटण्डा. यहां पहुंचने पर एकबारगी आपको स्कूल नाम की किसी चीज की भनक तक नहीं लगेगी. बीच टांड़ में कटहल का एक पेड़ शांत खड़ा दिखेगा. इसी पेड़ के साये तले है बिरहोर बच्चों का स्कूल. दरअसल विद्यालय का अपना कोई भवन नहीं. पेड़ के नीचे बैठकर बच्चे पढ़ते हैं, बिल्कुल खुले में. हालांकि ठंड में सर्द हवाओं का झोंका और गर्मी में लू के थपेड़ों के बीच बच्चे जैसे-तैसे तो पढ़ लेते हैं पर बरसात के मौसम में दिक्कतें आती हैं. बारिश होने पर पढ़ाई रोकनी पड़ती है. बच्चों के पढ़ने के लिए साल में एक बार सरकार की तरफ से मुफ्त में किताबें मिल जाती हैं लेकिन कॉपी-कलम और स्लेट-पेंसिल का जुगाड़ बच्चों के अभिभावकों को खुद ही करना पड़ता है. और अच्छी बात ये है कि तमाम अभावों के बावजूद बच्चों के मां-बाप उन्हें ये सुविधाएं मुहैय्या कराने की भरपूर कोशिश करते हैं. पिपराडीह बिरहोरटण्डा के बिरहोर बच्चों में पढ़ाई-लिखाई का अलख जगाने का काम महादेव महतो नाम के एक युवा कर रहे हैं. महादेव महतो काफी समर्पित शिक्षक निकले. बच्चों को पढ़ने के लिए प्रेरित करने में उन्हें बेहद मेहनत करनी पड़ी. पकड़-पकड़कर बच्चों को पढ़ने के लिए उन्हें बिठाना पड़ा. नजर हटी नहीं कि बच्चे फुर्र. दरअसल यहां के बिरहोर बच्चों का काम तो पहले बस खेल-खिलंदड़ ही करना था. या तो जंगल जाकर खरगोश-नेवला पकड़ते या फिर लकड़ियां चुनकर लाते. पास के पोखर में मछलियां पकड़ने भी भाग जाते थे. लड़कियां भी पत्ते-दातुन लाने जंगल निकल जाती थीं. सो बिरहोर बच्चों को शुरू-शुरू में पढ़ने-लिखने में बहुत उकताहट महसूस होती थी लेकिन आज स्थिति एकदम जुदा है.शिक्षक महादेव महतो ने बच्चों में पढ़ने की ललक तो पैदा की ही, साथ ही उनके मां-बाप को भी जागरुक करना शुरू किया. आज आलम ये है कि पिपराडीह बिरहोरटण्डा का एक भी बच्चा स्कूली शिक्षा से दूर नहीं है. बच्चे जैसे ही ठीक ढंग से बोलना-चलना शुरू कर देते हैं, उनके मां-बाप स्लेट लेकर स्कूल भेज देते हैं. आज ये बच्चे जब राग में कविताएं पढ़ते हैं तो अनपढ़ रह गए उनके मां-बाप गदगद हो जाते हैं. कल तक जिन बच्चों को कमउम्र में ही दूसरों के घर काम करने के लिए भेज दिया जाता था, उन्हें स्कूल भेजकर ये लोग गर्व महसूस करते हैं.
इस गांव में एक साथ तीन पीढ़ियां देखने को मिल जाएंगी पर यहां के बिरहोर आदिम जनजाति की यह पहली पीढ़ी है जो बाकायदा पूर्णकालिक पढ़ाई में लीन है.
सबसे बड़ी बात ये है कि शिक्षा के नाम पर बिरहोर लोग लड़का-लड़की का फर्क नहीं करते जैसा कि ग्रामीण इलाकों में अक्सर देखा जाता है. अगर पिपराडीह बिरहोरटण्डा के इस अभियान विद्यालय में पढ़ने वाले बच्चों पर नजर फिराएं तो स्थिति एकदम साफ हो जाती है. स्कूल की पहली क्लास में कुल तेरह बच्चे हैं जिनमें से आठ लड़कियां हैं और पांच की संख्या में लड़के हैं. अमूमन देखा ये जाता है कि किसी क्लास में लड़कियों की संख्या लड़कों की तुलना में कम ही होती हैं. पर पिपराडीह बिरहोरटण्डा में मामला एकदम उलट है. हालांकि दूसरी क्लास में तीन लड़के हैं और दो लड़कियां पर बाकी के क्लास में लड़कियां ही ज्यादा संख्या में हैं. तीसरी क्लास में जहां तीन लड़के और चार लड़कियां हैं वहीं चौथी क्लास में सात लड़कों के मुकाबले नौ लड़कियां पढ़ रही हैं. स्कूल में कुल 41 बच्चे पढ़ रहे हैं जिनमें 23 लड़कियां हैं और 18 लड़के. सचमुच आंकड़े उत्साहजनक हैं.इस गांव में एक साथ तीन पीढ़ियां देखने को मिल जाएंगी पर यहां के बिरहोर आदिम जनजाति की यह पहली पीढ़ी है जो बाकायदा पूर्णकालिक पढ़ाई में लीन है. खास बात ये कि यहां के बिरहोर बच्चे किसी भी मामले में कमतर नहीं. 12 साल की गहनी कुमारी की ही मिसाल लें. वो चौथी क्लास में पढ़ती है पर आसानी से हिंदी और अंग्रेजी लिख-पढ़ लेती है. बीस तक का पहाड़ा उसे कंठस्थ है और जरुरत पड़ने पर वो दूसरे बच्चों को भी पढ़ा लेती है. बिरेश कुमारी भी पढ़ाई-लिखाई के मामले में अव्वल है. बिरेंद्र बिरहोर, अनिल बिरहोर, संतोष बिरहोर जैसे बच्चे भी लिखने-पढ़ने में कम होशियार नहीं हैं. परमिल, संजय, फूलकुमारी, बिरसु, कंचन, सुरेश, सावनी, चरकी, चंपा, संगीता, गुड़िया, मालती, बिनोद जैसे कई बिरहोर बच्चे हैं जो एक नया कल लिखने को बेताब दिखते हैं. अगर आज ये बच्चे पढ़ पा रहे हैं तो इसके लिए उनके अनपढ़ अभिभावकों को भी शाबाशी देनी ही होगी.

Saturday, July 3, 2010

कौन पूरा करेगा सावनी का सपना

कौन पूरा करेगा सावनी का सपना

संदीप कुमार,

बगोदर (गिरिडीह), झारखंड से लौटकर

ग्यारह बरस की सावनी के सपने से हो सकता है आप इत्तफाक न रखें. मगर अमूमन घुमक्कड़ और फक्कड़ मानी जाने वाली झारखंड की बिरहोर आदिम जनजाति की सावनी के मन में उम्मीदों का सावन उमड़-घुमड़ रहा है. वह दीदी बनना चहती है. ‘दीदी जी’ मतलब मैडम. मैडम मतलब मास्टरनी. जी हां, इस इलाके के लोग स्कूलों में पढ़ाने वाली शिक्षिकाओं को मैडम से ज्यादा ‘दीदी जी’ ही कहते हैं. और सावनी का सपना किसी स्कूल में ‘दीदी जी’ का बनना है, जहां वो बच्चों को पढ़ाएगी और अगर बच्चे बदमाशी करेंगे तो प्यार से उनकी ‘कनेठी’ भी कसेगी.

स्कूल में बिरहोर बच्चे


सावनी पांचवीं क्लास में पढ़ती है. आप जानना चाहेंगे किस स्कूल में पढ़ती है वह? एक ऐसा स्कूल जहां दरो-दीवार नहीं, अनंत तक खुला आसमान है. इस स्कूल में सावनी और उसके जैसे चालीसेक बच्चों के सपने पल रहे हैं.

जी हां, सावनी का स्कूल एक पेड़ के नीचे चलता है. चिलचिलाती धूम में भी, झमाझम बारिश में भी और कंपकंपाती ठंड में भी. पेड़ के नीचे बोरा बिछाकर बैठते हैं सभी बच्चे. यहीं सुबह क्लास लगती है. पहली से पांचवीं तक के बच्चे एक साथ ही बैठते हैं. असल में 2004 में शिक्षा गारंटी योजना (एजुकेशन गारंटी स्कीम-ईजीएस) के तहत झारखंड के पिछड़े इलाके बगोदर में यह केंद्र खोला गया.

पास के गांव कानाडीह से महादेव महतो नाम का एक युवा किसान सामुदायिक शिक्षक के तौर पर यहां पढ़ाने पहुंचा. बिरहोर समुदाय की ये पहली पीढ़ी थी जिन्हें पढ़ने का मौका मिल रहा था. महादेव महतो की कोशिशों के बाद बच्चों ने पढ़ने में दिलचस्पी ली और उनके अभिभावकों ने पढ़ाने में.

साल 2006 में ईजीएस सेंटर को उत्क्रमित प्राथमिक विद्यालय के तौर पर अपग्रेड कर दिया गया. लेकिन सुविधाओं के नाम पर कुछ नसीब नहीं हुआ. तब भी स्कूल खुले में चलता था और अब भी उसे छत नसीब नहीं हुई. हां, इस बीच, पढ़ाने के लिए एक और सामुदायिक शिक्षक मुश्ताक अहमद यहां आने लगे.

जहां तक सावनी की बात है तो उसका परिवार बगोदर प्रखंड के पिपराडीह बिरहोरटंडा में रहता है. आबादी के हिसाब से लुप्तप्राय होती जा रही बिरहोर आदिम जनजाति के कुल जमा 13 परिवार यहां बसते हैं. जंगल के करीब ही बिरहोरों की झोपड़ियों का ये झुरमुट है. पिपराडीह बिरहोरटंडा झारखंड के उग्रवाद प्रभावित गिरिडीह जिले का वो इलाका है जहां आज भी लोग बेबसी में जी रहे हैं.

वैसे पिपराडीह बिरहोरटंडा में आंगनबाड़ी केंद्र भी खोला गया जहां सावित्री देवी सेविका के तौर पर सेवा देने लगीं. लेकिन आंगनबाड़ी केंद्र के लिए भी कोई भवन नहीं बना और ये भी खुले में चलता है जहां देश के नौनिहाल पलते और पढ़ते हैं.

गौरतलब है कि 14 साल तक के बच्चों को शिक्षा देने के लिए कानून तक बन गया है. इससे पहले भी सर्व शिक्षा अभियान के तहत हर बच्चे को स्कूल तक पहुंचाने की कवायद हो रही है. स्कूलों में अतिरिक्त कमरे बन रहे हैं. सामुदायिक शिक्षक चुने जा रहे हैं. स्कूलों का अपग्रेडेशन हो रहा है. मोहल्लों में शिक्षा गारंटी केंद्र खुल रहे हैं. टोलों में आंगनबाड़ी केंद्र खोले जा रहे हैं. बहुत कुछ हो रहा है या फिर होता दिख रहा है हर बच्चे को शिक्षित करने के लिए.

लेकिन विडंबना यह है कि पिपराडीह बिरहोरटंडा में एक अदद स्कूल अब तक नहीं बन पाया है. ग्राम शिक्षा समिति के अध्यक्ष जटू बिरहोर कहते हैं, “पिछले पांच-छह सालों से पेड़ के नीचे स्कूल चल रहा है और इधर कोई ध्यान ही नहीं देता.”

सावनी वहां पढ़ाना चाहती है जहां के स्कूल में कमरे हों, बिल्डिंग हो. जाहिर तौर पर सावनी और उसके जैसे और बच्चे ये भी चाहते हैं कि बिरहोरटंडा में स्कूल का भवन बने.


हालांकि इस समुदाय को आश्वासन मिला है कि जल्द ही शिक्षा समिति के फंड में स्कूल के भवन निर्माण के लिए पैसे आएंगे लेकिन अभी ये दूर की कौड़ी ही नजर आ रही है.

शिक्षक महादेव महतो कहते हैं कि बारिश के दिनों में ठीक से क्लास तक नहीं लग पाती है. लेकिन खुशी की बात ये है कि बगैर स्कूल के जमीन में बोरों पर बैठकर-पढ़कर बच्चों का एक पूरा बैच यहां से पाचवीं पास कर निकल गया. अब ये बच्चे पास के ही पिपराडीह मध्य विद्यालय में छठी क्लास में पढ़ने जाते हैं. इनमें गहनी और बिरेश जैसी लड़कियां हैं तो प्रकाश, बीरेंद्र और संतोष बिरहोर जैसे लड़के भी हैं जो अब कई टोलो-मोहल्लों से आए बच्चों को पढ़ाई-लिखाई में टक्कर दे रहे हैं.

अभी पिपराडीह बिरहोरटंडा के भवनहीन उत्क्रमित प्राथमिक विद्यालय में 45 बच्चे हैं. पांचवीं क्लास में सावनी समेत नौ बच्चे पढ़ रहे हैं. लड़का-लड़की में कोई भेद नहीं. हर बच्चा पढ़ रहा है. खास बात यह है कि पिपराडीह बिरहोर समुदाय की ये पहली पीढ़ी है जो व्यवस्थिति तौर पर पढ़ रही है और इन बच्चों के अनपढ़ मां-बाप खुश हैं कि उनका बच्चा अब ‘बुड़बक’ नहीं रहेगा.

लेकिन गिरधारी बिरहोर बड़ा वाजिब सवाल उठाते हैं. कहते हैं कि दूसरी जगह के स्कूलों में ‘दुतल्ला ठोका गया’ (दो मंजिला भवन बन गया) और हमारे यहां एक कमरा भी नहीं बना. गिरधारी के इस सवाल का जवाब दिया जाना जरूरी है, नहीं तो ऐसा लगेगा कि मौजूदा व्यवस्था के लिए बिरहोर कोई मायने नहीं रखते. ना वोट बैंक के लिहाज से और ना ही विरोध करने की जमात के तौर पर.

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पढ़ने लगे बिरहोर

गिरधारी बिरहोर की ही बेटी है सावनी. वह ‘दीदी जी’ तो बनना चाहती हैं लेकिन अपने ही बिरहोरटंडा के स्कूल में नहीं. जानते हैं क्यों? क्योंकि यहां के स्कूल में तो ‘घर’ (कमरा) है ही नहीं. सावनी वहां पढ़ाना चाहती है जहां के स्कूल में कमरे हों, बिल्डिंग हो. जाहिर तौर पर सावनी और उसके जैसे और बच्चे ये भी चाहते हैं कि बिरहोरटंडा में स्कूल का भवन बने. जब-जब यहां के बच्चे पास के गांव जाते हैं तो वहां के स्कूल भवन को ललचाई निगाहों से देखते ही रह जाते हैं.

सावनी पिपराडीह मिडिल स्कूल की तरफ इशारा करके जब कहती है कि अब ‘हमो वहैं पढ़बे’ तब सावनी के दर्द को बखूबी महसूसा जा सकता है. सावनी के इस दर्द को समझना जरूरी है. कोई पढ़ना चाहता है, बढ़ना चाहता है तो उसके लिए मुकम्मल इंतजाम करने में कोताही दिखाना नौनिहालों के साथ मजाक ही होगा. और ये भी ध्यान रखना होगा कि सावनी का सुंदर सपना कहीं टूट ना जाए